सर्दियों की हल्की धूप थी। गाँव की चौपाल के पास पुराना बरगद का पेड़ आज भी उसी तरह खड़ा था, जैसे पिछले सौ सालों से गाँव की हर पीढ़ी को आते-जाते देख रहा हो। पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठे थे अस्सी साल के दयाराम काका। सफेद धोती, कंधे पर गमछा और चेहरे पर उम्र की झुर्रियों के बावजूद एक अजीब चमक थी। पास ही कुछ बच्चे खेल रहे थे। औरतें कुएँ से पानी भरकर ला रही थीं। दूर खेतों में सरसों के पीले फूल हवा में झूम रहे थे। तभी शहर से आया उनका पोता अर्जुन वहाँ पहुँचा। हाथ में मोबाइल, आँखों पर चश्मा और चेहरे पर थकान।
दयाराम काका ने मुस्कुराते हुए पूछा,
“क्यों बेटा, शहर ने फिर से बीमार कर दिया क्या?”
दादाजी, डॉक्टर ने कहा है चीनी बंद करो, घी बंद करो, चाय कम पियो, बाहर का खाना मत खाओ… अब समझ नहीं आता खाएँ क्या?”
“अजीब समय आ गया है… पहले लोग गुड़ खाते थे, देसी घी खाते थे, लस्सी पीते थे, मक्खन खाते थे… फिर भी खेतों में दिनभर काम करते थे। किसी को शुगर नहीं होती थी। गाँव में कैंसर का नाम तक सुनने को नहीं मिलता था। और आज… आदमी रोटी खाते हुए भी डरता है।”
अर्जुन ने मोबाइल जेब में रखा और दादा के पास बैठ गया। उसे पता था, अब एक लंबी कहानी शुरू होने वाली है।
“जब मैं छोटा था ना, तब हमारे घर में सुबह ताज़ा दूध निकलता था। दादी उसी से मक्खन निकालती थी। फिर गर्मागर्म बाजरे या गेहूँ की रोटी पर देसी घी लगाया जाता था। खेत में काम करने वाले आदमी दस-दस रोटियाँ खा जाते थे। ऊपर से गुड़ भी।”
“फिर भी कोई बीमार नहीं पड़ता था?” अर्जुन ने पूछा।
दयाराम काका हँसे।
“बीमारी होती थी बेटा… लेकिन इतनी नहीं। और इतनी छोटी उम्र में तो बिल्कुल नहीं। क्योंकि उस समय खाना शरीर में लगता था, आज की तरह सिर्फ पेट में नहीं भरता था।”
अर्जुन उनकी बात समझ नहीं पाया। दयाराम काका ने समझाया-
“पहले आदमी मेहनत करता था। खेत जोतता था, बैलों के पीछे चलता था, कुएँ से पानी खींचता था। शरीर हर समय काम करता था। आज शहर में आदमी सुबह से रात तक कुर्सी पर बैठा रहता है। शरीर चलता नहीं, लेकिन दिमाग हर समय दौड़ता रहता है।”
“आज बीमारी का सबसे बड़ा कारण सिर्फ खाना नहीं, जीवन जीने का तरीका भी है।”
“पहले खाना खेत से सीधे घर आता था। आज खेत से फैक्ट्री जाता है, फैक्ट्री से पैकेट बनकर बाजार आता है। उसमें स्वाद बढ़ाने के लिए केमिकल, महीनों खराब न हो इसलिए प्रिज़र्वेटिव, रंग अच्छा दिखे इसलिए आर्टिफिशियल कलर… इंसान खाना कम और रसायन ज्यादा खा रहा है।”
दयाराम काका ने गहरी साँस ली।
“पहले दूध दो दिन में खराब हो जाता था। अब महीनों तक खराब नहीं होता। सोचो, जो चीज़ प्रकृति में जल्दी खराब होनी चाहिए, उसे महीनों तक जिंदा रखने के लिए क्या-क्या मिलाया जाता होगा?”
अर्जुन के चेहरे पर चिंता उतर आई।
तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी वहाँ आया। उसका नाम हरिराम था। कभी पूरे गाँव में सबसे ताकतवर माना जाता था। लेकिन अब वह बहुत कमजोर दिख रहा था।
दयाराम काका ने धीरे से कहा,
“इसे कैंसर है।”
“लेकिन आपने तो कहा था पहले ऐसी बीमारियाँ नहीं होती थीं?”
“अब गाँव भी पहले जैसे नहीं रहे बेटा।”
“हमने भी अब वही खाना शुरू कर दिया जो शहर वाले खाते हैं। बच्चों को पैकेट वाली चीज़ें पसंद हैं। खेतों में दवाइयाँ बढ़ गईं। हवा बदल गई। पानी बदल गया। और आदमी का मन भी बदल गया।”
कुछ देर तक वहाँ सन्नाटा छाया रहा।
“दादाजी… क्या ये सब बड़ी कंपनियों की चाल है? क्या लोगों को जानबूझकर डराया जाता है?”
दयाराम काका ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उन्होंने दूर सड़क की तरफ देखा, जहाँ एक बड़ा विज्ञापन लगा था-
“शुगर फ्री लाइफ जियो!”
उसके नीचे एक महँगा पैकेट वाला ड्रिंक बना था। दयाराम काका हल्का मुस्कुराए।
“देख बेटा… दुनिया व्यापार पर चलती है। जो चीज़ बिकती है, वही दिखाई जाती है। पहले लोग घर का सत्तू पीते थे, अब टीवी कहता है कि असली ताकत बोतल वाले ड्रिंक में है। पहले घर की रोटी थी, अब पैकेट वाले हेल्दी स्नैक्स हैं। डर सबसे बड़ा व्यापार बन गया है।”
उसे याद आया कि उसके शहर में लोग सुबह जिम जाते हैं, लेकिन लिफ्ट से ऊपर चढ़ते हैं। महँगे हेल्थ ड्रिंक पीते हैं,
लेकिन पूरी रात जागते हैं। सोशल मीडिया पर फिटनेस की बातें करते हैं, लेकिन मन हमेशा तनाव में रहता है। शायद बीमारी केवल खाने में नहीं, इंसान की पूरी जीवनशैली में घुल चुकी थी।
“बेटा, असली समस्या घी, चीनी या गेहूँ नहीं हैं। असली समस्या है लालच, मिलावट और प्रकृति से दूरी।”
“जितना हो सके असली खाना खाओ। थोड़ा चलो-फिरो। समय पर सोओ। कम तनाव लो। और सबसे जरूरी… हर चमकती चीज़ को स्वास्थ्य मत समझो।”
अर्जुन ने पहली बार बिना डर के खाना खाया। उसे महसूस हुआ कि शायद समस्या खाने में कम, इंसान की सोच में ज्यादा आ चुकी है।





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