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जब पंजाब का आखिरी महाराजा अपने ही देश लौटने के लिए तरस गया। सिख साम्राज्य के आखिरी महाराजा दलीप सिंह की दर्दनाक कहानी, जिसे पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

 


भारत के इतिहास में बहुत सारी ऐसी घटनाएं पढ़ने को मिलती है जो हमें अंदर तक झँझोर कर रख देती हैं और हमें अपने भारतीय होने का गर्व महसूस करवाती हैं। 

    इतिहास की एक ऐसी ही दर्दनाक कहानी हम आपके सामने लेकर आए हैं जो संबंधित है पंजाब के शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे पुत्र महाराजा दलीप सिंह की, जिसे पढ़कर अपने रोंगटे खड़े हो जाएंगे।  एक ऐसे बालक की कहानीजिसे बचपन में ही ताज तो मिलालेकिन उस ताज की कीमत उसे अपना परिवारअपना धर्मअपनी पहचान और अपना पूरा साम्राज्य देकर चुकानी पड़ी।

    यह कहानी शुरू होती है पंजाब की उस धरती से जहाँ कभी महाराजा रणजीत सिंह का राज हुआ करता था। वह समय ऐसा था जब पूरे भारत में अंग्रेजों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। एक-एक करके बड़े-बड़े राजा अंग्रेजों के सामने झुकते जा रहे थे। लेकिन पंजाब एक ऐसा इलाका था जहाँ अंग्रेज आसानी से कदम रखने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। कारण था - महाराजा रणजीत सिंह।

    रणजीत सिंह केवल एक राजा नहीं थेबल्कि एक दूरदर्शी शासक और महान योद्धा थे। उन्होंने बिखरी हुई सिख मिसलों को एकजुट करके एक विशाल सिख साम्राज्य खड़ा किया था। उस समय पंजाब सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं था। उनका साम्राज्य कश्मीर, मुल्तान, पेशावर और लद्दाख तक फैला हुआ था।

    अफगान हमलावरों का आतंक उन्होंने समाप्त कर दिया था। उनकी सेना इतनी शक्तिशाली थी कि अंग्रेज भी सीधे युद्ध करने से डरते थे। उन्होंने यूरोप से सैन्य विशेषज्ञ बुलाएआधुनिक तोपखाना तैयार किया और अपनी फौज को उस समय की सबसे अनुशासित सेनाओं में बदल दिया।

लेकिन रणजीत सिंह की सबसे बड़ी खूबी उनकी धार्मिक सहिष्णुता थी। उनके दरबार में हिंदू मंत्री थेमुस्लिम अधिकारी थेसिख सेनापति थे। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उन्होंने स्वर्ण मंदिर अमृतसर को सोने से सजवायामंदिरों को दान दिया और मस्जिदों की मरम्मत भी करवाई। जनता उन्हें केवल राजा नहींबल्कि अपना रक्षक मानती थी।

    फिर 1839 में वह दिन आया जिसने पंजाब की तकदीर बदल दी। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। उनकी मौत के साथ ही मानो पूरा साम्राज्य अनाथ हो गया।

    दरबार षड्यंत्रों से भर गया। सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया। एक के बाद एक उत्तराधिकारी रहस्यमयी परिस्थितियों में मरने लगे। कहीं ज़हरकहीं हत्याकहीं गद्दारी।

    इसी अराजकता के बीच 6 सितंबर 1838 को जन्मा एक छोटा-सा बच्चा धीरे-धीरे इतिहास के सबसे दुखद पात्रों में बदलने वाला था — दलीप सिंह।

    उसकी माँ महारानी जिंद कौर थींजिन्हें लोग प्यार से “रानी जिंदां” कहते थे। वे बेहद सुंदरतेजस्वी और साहसी महिला थीं। हालाँकि वे रणजीत सिंह की सबसे कम उम्र की रानी थींलेकिन राजनीति की उनकी समझ बहुत गहरी थी।

जब दलीप सिंह केवल एक वर्ष के थेतभी उनके पिता का निधन हो गया।

महल की दीवारों के भीतर साजिशें शुरू हो चुकी थीं। हर कोई सत्ता चाहता था। हर कोई सिंहासन पर कब्जा करना चाहता था।

रानी जिंद कौर ने अपने छोटे बेटे को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। वे जानती थीं कि अंग्रेज पंजाब पर कब्जा करना चाहते हैं। वे समझ चुकी थीं कि यदि पंजाब कमजोर पड़ातो अंग्रेज सब कुछ छीन लेंगे।

    1843 मेंकेवल पाँच वर्ष की आयु में दलीप सिंह को पंजाब का महाराजा घोषित कर दिया गया। एक छोटा बच्चाजिसके हाथों में खिलौने होने चाहिए थेउसके सिर पर पूरे साम्राज्य का ताज रख दिया गया। असल सत्ता उसकी माँ और दरबार के सरदारों के हाथों में थी। रानी जिंद कौर पर्दे के पीछे से शासन संभाल रही थीं। वे अंग्रेजों की चालों का खुलकर विरोध करती थीं।

    अंग्रेजों को रानी जिंद कौर से डर लगने लगा था। उन्हें लगता था कि यदि यह महिला खालसा सेना और जनता को एकजुट कर देगीतो पंजाब फिर से शक्तिशाली हो जाएगा।

    उधर अंग्रेज लगातार मौके की तलाश में थे। 1845 में पहला आंग्ल-सिख युद्ध शुरू हुआ। सिख सैनिकों ने बहादुरी की ऐसी मिसाल पेश की कि अंग्रेज भी दंग रह गए। लेकिन दरबार के कुछ गद्दार सरदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया। इस विश्वासघात ने पंजाब को कमजोर कर दिया।

    युद्ध के बाद अंग्रेजों ने लाहौर संधि करवाई। धीरे-धीरे अंग्रेजी सेना लाहौर में रहने लगी। अब असली सत्ता पर अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ने लगा। लेकिन रानी जिंद कौर अभी भी हार मानने को तैयार नहीं थीं। वे लगातार अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को प्रेरित कर रही थीं। अंग्रेज समझ चुके थे कि यह महिला उनके लिए सबसे बड़ा खतरा है।

    फिर एक दिन अंग्रेजों ने वह किया जिसने दलीप सिंह की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। रानी जिंद कौर को उनके बेटे से अलग कर दिया गया। उन्हें कैद कर लिया गया।

    सोचिए… एक छोटा बच्चाजिसने पहले पिता को खोयाअब उसकी माँ भी उससे छीन ली गई।इतिहासकार लिखते हैं कि दलीप सिंह अपनी माँ से बहुत प्यार करते थे। जब उन्हें अलग किया गयातब वे रोते रहेलेकिन अंग्रेजों ने उनकी एक न सुनी। इसके बाद दलीप सिंह पूरी तरह अंग्रेजों की निगरानी में आ गए। उन्हें धीरे-धीरे उनकी भाषासंस्कृति और धर्म से दूर किया जाने लगा।

    1848 में दूसरा आंग्ल-सिख युद्ध हुआ। इस बार भी सिख सैनिकों ने जान की बाजी लगा दीलेकिन अंततः 1849 में पंजाब अंग्रेजों के अधीन चला गया। सिख साम्राज्य समाप्त हो गया।

    फिर वह क्षण आया जो आज भी सिख इतिहास के सबसे दुखद पलों में गिना जाता है। दुनिया का प्रसिद्ध कोहेनूर हीराजो कभी महाराजा रणजीत सिंह की शक्ति का प्रतीक थाअंग्रेजों ने छीन लिया।एक छोटे बालक दलीप सिंह से कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और कोहिनूर इंग्लैंड भेज दिया गया।

    इसके बाद दलीप सिंह को अंग्रेज अधिकारी John Spencer Login की देखरेख में रखा गया। उन्हें अंग्रेजी शिक्षा दी गई। उनके बालों और सिख पहचान को बदलने की कोशिशें शुरू हुईं।

    1853 में दलीप सिंह ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। सिख समुदाय के लिए यह बेहद दुखद घटना थी। लेकिन बहुत से इतिहासकार मानते हैं कि यह निर्णय एक अकेले और मानसिक रूप से टूट चुके युवक पर अंग्रेजी प्रभाव का परिणाम था।

    1854 में वे इंग्लैंड चले गए। वहाँ उनका स्वागत किसी राजकुमार की तरह हुआ। Queen Victoria उन्हें बहुत पसंद करती थीं। उनकी तस्वीरें बनवाई गईंउन्हें शाही समारोहों में बुलाया गया। बाहर से सब कुछ शानदार दिखाई देता था। लेकिन अंदर ही अंदर दलीप सिंह टूट चुके थे। उन्हें एहसास होने लगा था कि उनसे सब कुछ छीन लिया गया है।

    1861 में उनकी मुलाकात फिर से उनकी माँ रानी जिंद कौर से हुई। यह मुलाकात बेहद भावुक थी।कहा जाता है कि रानी ने अपने बेटे को पंजाबउसके पिता और अंग्रेजों की चालों के बारे में विस्तार से बताया। यहीं से दलीप सिंह के भीतर फिर से सिख पहचान जागने लगी।

    धीरे-धीरे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बोलना शुरू किया। वे अपना खोया हुआ राज्य वापस पाना चाहते थे। 1886 में उन्होंने दोबारा सिख धर्म स्वीकार कर लिया। यह केवल धर्म में वापसी नहीं थीबल्कि अपनी पहचान में वापसी थी। उन्होंने भारत लौटने और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की योजना बनाई। रूस से सहायता लेने की कोशिश भी की। लेकिन अंग्रेज सरकार हर समय उन पर नजर रखे हुए थी। उन्हें रास्ते में ही रोक दिया गया।

 

 जीवन के अंतिम वर्षों में दलीप सिंह अकेले पड़ गए थे। वे अपने खोए हुए पंजाब को कभी वापस नहीं पा सके। 22 अक्टूबर 1893 को Paris में उनका निधन हो गया। 

 

 लेकिन उनकी कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

    आज भी जब सिख इतिहास की बात होती हैतो महाराजा दलीप सिंह को उस मासूम बच्चे के रूप में याद किया जाता है जिससे बचपन में उसका राज्यउसका परिवार और उसकी पहचान छीन ली गई थी और रानी जिंद कौर को उस माँ के रूप मेंजिसने अंतिम साँस तक अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया।

 

 


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